6:55 pm - Thursday April 19, 2018

जानिए सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट में क्या किए बदलाव, जिन्हें लेकर देशभर में है बवाल

एससी एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए बदलाव के खिलाफ देशभर में दलित संगठनों ने बंद का ऐलान किया है। जिसका व्यापक असर हरियाणा सहित पूरे भारत में दिखाई दे रहा है। प्रदर्शनकारी जगह-जगह जाम लगाकर तोड़फोड़ कर रहे हैं। जिससे यातायात, शिक्षण संस्थान, चिकित्सक सहायता सहित हर क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लेकर केंद्र सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को महाराष्ट्र के एक मामले को लेकर एससी एसटी एक्ट में नई गाइडलाइन जारी की थी। जिसको लेकर भारत बंद का ऐलान कर प्रदर्शकारी विरोध पर सड़कों पर उतर आए हैं-

सुप्रीम कोर्ट ने जारी की नई गाइडलाइन 
* नई गाइडलाइन के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989  के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है।

* अब अगर शिकायत मिलती है तो तुंरत मुकद्दमा दर्ज नहीं होगा।

* शिकायत की जांच डीएसपी लेवल के पुलिस अफसर द्वारा की जाएगी और यह जांच समयबद्ध होगी।

* इसके अलावा यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरूपयोग करता है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी।

* सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है।

* सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए भी आवेदन कर सकते हैं।

* अब अगर एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को  मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए, तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी।

* सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्रवाई के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा।

अब तक एससी/एसटी एक्ट 1989 में थे ये नियम
* इससे पहले एससी/एसटी एक्ट में जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होता था।

* ऐसे मामलों में जांच केवल इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर ही करते थे।

* इन मामलों में केस दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी का भी प्रावधान था।

* इस तरह के मामलों में अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी। सिर्फ हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकती थी।

* इसके इलावा  सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होती थी।

* यहां तक कि एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होती थी।

* एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 मामलों की शिकायतें सामने आई थी। इनमें से दर्ज हुईं शिकायतों में से 935 झूठी पाई गईं।

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