11:02 pm - Wednesday February 22, 2017

घोषणाओं में उलझती बेरोजगारों की आवाज़

जैसे ही सत्ता बदलती है, बेरोज़गारों की उम्मीदें उस वक्त आसमान छू रही होती है।प्रदेश का बेरोज़गार युवा वर्ग अखबारों में रोजगार के नये-नये वादे देखकर खुश हो जाता है की चलो अब प्रदेश तो तरक्की कर रहा है और वो इसी तरक्की वाले आकड़ों के दम पर नौकरी पाने के सपने पाल बैठता है।

अक्सर नेताओं के भाषणों में बेरोज़गारी को दूर करने की महत्वाकांक्षा लाखों युवाओं में जोश भर देती है। ऐसा दिखाया जाता है की वे ही उनके पालनहार है, वे सभी को चुटकियों में नौकरी दे देंगे। बस कमी यही है की लोग सत्ता में बैठे निकम्मों की जगह उन्हें दे दें। प्रदेश का बेरोजगार मतदाता जिसे चाहे उसे वोट दे, लेकिन वोट डालने के बाद अंधभक्त होने के बजाय उनके प्रति सख्त रवैया दिखाए।

कभी कोई सरकारें जनता को ये क्यों नहीं बताती की उसने अपने कार्यकाल में कितनी रिक्तियाँ निकली, कितनों को नौकरियां दी और उन नौकरी पाने वालों में नेताओं के कितने भाई-भतीजे थे? अगर ऐसा होता तो रोज़गार के नाम पर बेरोज़गार युवाओं को इतनी आसानी से नहीं ठगा जाता, जितनी आसानी से अबतक ठग लिया गया है।

सबसे अहम सवाल है की ये बेरोज़गार हैं कौन? ये कोई डुप्लेक्स बंगले में रहने वाले अरबपति के बेटे नहीं हैं। इनका बाप न ही किसी फैक्ट्री का मालिक है और न ही ये किसी सांसद या विधायक के सगे संबंधी होते हैं। ये सरकार द्वारा आंकड़ों में उलझाया व टोयोटो से चलने की सपने देखता युवा होता है। 5X8 के कमरे में रहने वाला, मकान मालिक द्वारा सताया और कई बार भूखे सो जाने वाला छात्र होता है, जिसे हम भारत का भविष्य कहते हैं।

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